मायड़ भाषा में हो प्राथमिक शिक्षा: सुथार

जोधपुर। बच्चों के सर्वांगीण विकास हेतु यह जरूरी है कि उनको प्राथमिक शिक्षा अपनी मातृ भाषा में मिले। देश की आजादी के पश्चात् भाषाई दृष्टि से राजस्थान के लोगों के साथ आज तक शिक्षा की दृष्टि सें न्याय नहीं हुआ क्योंकि राजस्थान प्रदेश की समृद्ध एवं स्वतंत्र भाषा राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित नहीं किया गया लेकिन वर्तमान में केन्द्र सरकार द्वारा जारी नई शिक्षा नीति के तहत प्रत्येक राज्य में उस राज्य की मातृ भाषा में शिक्षा देने की बात कही गयी है अत: राजस्थान की सभी प्राथमिक स्कूलों में अध्ययनरत विद्याथियों को अपनी मातृ भाषा राजस्थानी में शिक्षा मिलनी ही चाहिये। यह हमारा संवैधानिक हक भी बनता है। यह विचार साहित्यिक संस्थान आखर फाउंडेशन द्वारा आयोजित साहित्य साधना कार्यक्रम में राजस्थानी भाषा के ख्यातनाम विद्वान भंवरलाल सुथार ने कही। इस अवसर पर उन्होंने राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति पर विस्तार से अपने विचार रखे।
कार्यक्रम संयोजक प्रमोद शर्मा ने बताया कि साहित्य साधना ऑनलाइन कार्यक्रम के अन्तर्गत राजस्थानी भाषा के ख्यातनाम रचनाकार भंवरलाल सुथार से राजस्थानी के युवा कवि एवं आलोचक महेन्द्रसिंह छायण ने विषेष साहित्यिक संवाद किया जिसमें भंवरलाल सुथार ने अपने जीवन, प्राथमिक शिक्षा, शहरी जीवन की समस्याओं एवं संघर्ष को रेखांकित किया। इस अवसर पर उन्होंने राजस्थानी साहित्य के ख्यातनाम रचनाकारों पद्मश्री सीताराम लाळस द्वारा शब्दकोष निर्माण एवं डॉ. नारायणसिंह भाटी द्वारा परम्परा पत्रिका सम्पादन की कार्यशैली को विस्तार से उजागर किया। साथ ही विजयदान देथा, कोमल कोठारी, सौभाग्यसिंह शेखावत, डॉ. रामप्रसाद व्यास, डॉ. रामप्रसाद दाधीच, श्यामसुंदर श्रीपत, नन्दकिशोर शर्मा, दीनदयाल ओझा, डॉ. शक्तिदान कविया, डॉ. आईदानसिंह भाटी, अर्जुनसिंह शेखावत, डॉ. कल्याणसिंह शेखावत, डॉ. वेंकट शर्मा, डॉ. भगवतीलाल शर्मा, जहूरखां मेहर, दीपचंद सुथार तथा महेन्द्रसिंह नगर आदि के साथ किये कार्यों के संस्मरण साझा किये।
इस अवसर पर राजस्थानी के युवा आलोचक डॉ. रामरतन लटियाल ने भंवरलाल सुथार की सद्य प्रकाशित पुस्तक कोरोना-काळ को आधुनिक राजस्थानी पद्य साहित्य की अनमोल कृति बताया। उन्होंने कहा कि मानवीय संवेदना से परिपूर्ण तथा समसामयिक मानवीय समस्याओं को उकेरने वाली यह कृति भाव, भाषा, शैली एवं शब्द संयोजन की दृष्टि से एक कालजयी रचना सिद्ध होगी। महिला लेखन को प्रोत्साहन देने वाले सुथार ने कोरोना काल में राजस्थानी महिलाओं के दूहा लेखन एवं युवा रचनाकारों के साहित्य अवदान पर प्रकाश डाला। इस ऑनलाइन कार्यक्रम में जितेन्द्र निर्मोही, बुलाकी शर्मा, नीरज दइया, देवकिशन राजपुरोहित, भरत ओला, गिरधरदान रतनू, दिनेश पांचाल, शिवसिंह भाटी, डॉ.गजेसिंह राजपुरोहित, विमला नागला, निर्मला राठौड़, मोहनसिंह रतनू, कैलाश पारीक, डॉ. भवानीसिंह पातावत, छैलू चारण छैल, करुणा दसोरा, जयसिंह आशावत, शिवदानसिंह जोलावास, राजेन्द्रसिंह मेहरा, सुरेन्द्र राव, अभिलाषा पारीक, सुरेन्द्र स्वामी, राजेन्द्रसिंह, शिवहरि शर्मा, राजेन्द्र शर्मा मुसाफिर, भोगीलाल पाटीदार, हरिमोहन सारस्वत रूंख, त्रिलोक माण्डण, संतोष गोदारा, मनमोहन शर्मा, मोनिका राज गोपा, किरण राजपुरोहित, चैनाराम महेला, शैतानाराम सुथार, मुरलीधर गौड़, अशोक माकड़, मांगूसिंह बिशाला, तरनीजा मोहन राठौड़, शिवराज विश्नोई, मदनसिंह सोलंकिया तला, डॉ. लक्ष्मणसिंह गड़ा सहित अनेक साहित्यकारों एवं भाषा प्रेमियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन युवा कवि महेन्द्रसिंह छायण ने किया। संयोजक प्रमोद शर्मा ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया।

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