विउपनिवेशीकरण के नये अर्थ खोजने की जरूरत है : प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल
जोधपुर। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर द्वारा आयोजित प्रोफेसर नामवर सिंह स्मृति व्याख्यान माला में चिंतक प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने मुख्य वक्ता के रूप में उद्बोधन देते हुए कहा कि तर्कसंगत और प्रमाणपुष्ट आलोचना किसी व्यक्ति विशेष के प्रति अवहेलना नहीं है अपितु श्रद्धा ही है । अग्रवाल ने कहा कि ‘अकथ कहानी प्रेम की’ पुस्तक को प्रकाशित करने में मैंने 32 वर्ष की तपस्या की ।
प्रो. नामवर सिंह एक आदर्श शिक्षक के साथ-साथ आदर्श शोधार्थी थे । प्रोफेसर नामवर सिंह ने स्थापित मान्यताओं में अनेक संशोधन किए हैं । कबीर आदि को उन्होंने अनुभवसम्मत विवेकवादी कहकर एक नूतन सिद्धांत स्थापित किया । रानाडे ने लिखा है कि मध्यकालीन संतों का रहस्यवाद उपनिषद् पर आधारित है । उपनिवेशीकरण ने सांस्कृतिक पहचान को प्रमुखता दी । आर्थिक शोषण और उससे उत्पन्न प्रभाव का उपनिवेशीकरण में कहीं कथन नहीं किया गया ।
उपनिवेशीकरण एक प्रकार का आर्थिक शोषण ही है । टिकायें भी नूतन सिद्धांतों को स्थापित करती हैं । विउपनिवेशीकरण का अर्थ यह है कि आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक उपक्रम है । हमारा निकटस्थ अतीत भी हमें अभिप्रेरित करता है । हम जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति से संवाद नहीं करते तब तक भी उपनिवेशीकरण संभव नहीं है । समारोह की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. के.एल. श्रीवास्तव ने कहा कि प्रोफेसर नामवर सिंह ने जोधपुर विश्वविद्यालय का नाम बहुत ऊंचा किया । ऐसे प्रोफेसर ही विश्वविद्यालय के गौरव होते हैं । समाज में नित्य नवाचार के द्वार खोलते हैं तथा शैक्षिक आयोजन करते हैं । व्याख्यानमाला के संयोजक प्रोफेसर किशोरीलाल रेगर ने प्रारंभ में अतिथियों का स्वागत किया । उन्होंने बताया कि यह व्याख्यानमाला 19 वर्ष बाद पुनः प्रारंभ हो रही है । इसका श्रेय कुलपति महोदय को जाता है । कार्यक्रम का संचालन हिंदी विभाग के डॉ. प्रेम सिंह राजपुरोहित ने किया । व्याख्यान माला में कला, शिक्षा एवं समाज विज्ञान संकाय की अधिष्ठाता प्रो. कल्पना पुरोहित, विज्ञान संकाय के प्रोफेसर चैनाराम चौधरी, हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. महीपाल सिंह राठौड़, सायंकालीन अध्ययन संस्थान के निदेशक प्रोफेसर कृष्ण अवतार गोयल, प्रो. कौशलनाथ उपाध्याय, परीक्षा नियंत्रक प्रो. के.आर. गेनवा, प्रो. सत्यनारायण, प्रो. सरोज कौशल, प्रो. कांता कटारिया, प्रो. यादराम मीना, प्रो. मंगलाराम बिश्नोई, प्रो. अजय सिंह, प्रो. सुशीला शक्तावत, डॉ. कुलदीप सिंह मीना, डॉ. राजश्री राणावत, डॉ. प्रवीण चन्द, डॉ. फत्ताराम नायक, डॉ. महेंद्र सिंह आदि बड़ी संख्या में शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे । अंत में प्रो. महीपाल सिंह राठौड़ ने धन्यवाद ज्ञापित किया ।