पाण्डुलिपि पठन में अक्षर एवं अंक विज्ञान का ज्ञान आवश्यक: डॉ. सद्दीक

जोधपुर। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के सौजन्य से एवं राजस्थानी शोध संस्थान चौपासनी के तत्वावधान में सात दिवसीय पाण्डुलिपि पठन एवं संरक्षण कार्यशाला के चौथे दिन सर्वप्रथम राजस्थानी शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. सद्दीक मोहम्मद ने संस्थान में स्थित विभिन्न ठिकानों की ऐतिहासिक बहियों पर प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि ठिकानों का राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक इतिहास लेखन किया जाए तो ये बहियें उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। उन्होंने तत्कालीन समय में प्रचलित बहियों की भाषा एवं लिपि, रुपया, आना, पैसा, दाम, टका आदि मुद्राओं की जानकारी दी। उस समय मण और सेर का तौल प्रचलित था। एक मण में कितने सेर होते थे? इस सम्बन्ध में भी शोधार्थियों को जानकारी दी। उन्होंने आना एवं पैसा को रुपये में परिवर्तित करने की विधि भी शोधार्थियों को बताई। ऐतिहासिक बहियों में जिन शब्दों के संक्षिप्त रूप मिलते हैं, उनसे भी शोधार्थियों को रूबरू कराया। उन्होंने कहा कि पाण्डुलिपि पठन के लिए अक्षर एवं अंक ज्ञान आतिआवश्यक है। यदि शोधार्थी राजस्थानी भाषा के अक्षरों की बनावट एवं अंकों का ज्ञान प्राप्त कर ले तो उन्हें पुरालेखीय सामग्री को पढऩे में आसानी होगी। इस अवसर पर शोधार्थियों की अंक विज्ञान से सम्बन्धित व्यावहारिक परिक्षा भी ली गई। स्वामी दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय अजमेर में इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. वीके वशिष्ठ के आलेख का वाचन सूर्यवीरसिंह ने किया। यह आलेख 1857 के विप्लव में अभिलेखीय सामग्री की भूमिका से सम्बन्धित था। आलेख में मुख्य रूप से राजस्थान राज्य अभिलेखागार, बीकानेर और जयपुर के दस्तावेजों पर महत्वपूर्ण जानकारी देने के साथ ही राष्ट्रीय अभिलेखागार, दिल्ली में सुरक्षित सामग्री में इस विप्लव से सम्बन्धित कई महत्त्वपूर्ण पत्र-दस्तावेजों का ब्यौरा दिया गया।

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Gulam Mohammed

(EDITOR SEVA BHARATI NEWS) ==> Seva Bharti News Paper Approved Journalist, Directorate of Information and Public Relations, Rajasthan, Jaipur (Raj.), Mobile 7014161119 More »

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