डॉ. राजपुरोहित की कृति पळकती प्रीत पर ऑनलाइन चर्चा

जोधपुर। राजस्थान के प्रेमाख्यांन पर आधारित राजस्थानी प्रबंध काव्य पळकती प्रीत मानवीय संवेदनाओं और सौंदर्यबोध से परिपूर्ण काव्य रचना है, जिसमें यहां की प्राचीन लोक प्रचलित प्रेम कथाओं को आधुनिक सोच और शैली में बहुत ही सुन्दर और शानदार रूप से रचा गया है। राजस्थानी संस्कृति से सराबोर ये कविताएं मानव के निश्छल प्रेम, स्वाभिमान, त्याग, बलिदान और समर्पण का पर्याय है। यह विचार राजस्थानी भाषा साहित्य के ख्यातनाम कवि आलोचक डॉ आईदानसिंह भाटी ने प्रभा खेतान फाउंडेशन द्वारा आयोजित कवि गजेसिंह राजपुरोहित की काव्यकृति पळकती प्रीत पर ऑनलाइन आयोजित कार्यक्रम आखर राजस्थान साहित्यिक चर्चा में बतौर अपने अध्यक्षीय उदबोधन में कही।
इस अवसर पर डॉ. आईदानसिंह भाटी ने कहा किसी भी देश की वास्तविक संस्कृति उसकी लोक संस्कृति में ही होती हैं, लोक मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह अपने से जुड़े लोक व्यवहार को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित कर उसे अमरता प्रदान करता है। प्रकृति से हदभांत जुड़ी ये प्रेम कविताएं मानव के पवित्र प्रेम का भाव उजागर करती है। उन्होंने कहा कि भारतीय प्रेम कथाओं को राजस्थानी भाषा लिखने की महत्ती दरकार है। प्रभा खेतान फाउंडेशन के सचिव प्रमोद शर्मा ने बताया कि ऑनलाइन कार्यक्रम के प्रारंभ में ईश वंदना के पश्चात जैसलमेर के राजस्थानी रचनाकार महेन्द्रसिंह छायण ने काव्यकृति पळकती प्रीत की प्रस्तावना से अवगत करवाते हुए कहा कि इन कविताओं ने मुक्त छंद का महत्व उजागर किया है। यह एक खास लय से कविता सृजन का सफल प्रयास है। कवि राजपुरोहित ने कुरीतियों को तोडक़र समाज में प्रेम बढ़ाने का प्रयास किया है।
बीज वक्तव्य देते हुए बीकानेर के राजस्थानी कवि राजूराम बिजारणियां ने कहा कि यह पुस्तक प्रबंध काव्य के रूप में है। इसमे प्रेम तत्व की बात है और प्रेम तत्व संसार में अवश्य है। प्रेम व्यापार का नहीं बल्कि व्यवहार का नाम है। इतिहास की गाथाएं बताती है कि राजस्थानी साहित्य प्रेम से समृद्ध है। इस अवसर पर बिजारनियां समालोचात्मक टिप्पणी देते हुए कहा कि यह पुस्तक राजस्थानी साहित्य में अपना अद्वितीय स्थान रखती है।
कोटा के ख्यातनाम कवि एवं समालोचक अतुल कनक ने समीक्षा करते हुए कहा कि सृजन के मूल में संवेदना होती है। अपने दुख को भी अभिव्यक्त करे तो ऐसा लगे कि दूसरे का दुख भी समान रूप से अभिव्यक्त हुआ है। उन्होंने कहा कि डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित ने प्रेम कथाओं पर प्रेम कविताओं का सृजन किया है। सृजन को अच्छे तरीके से अभिव्यक्त किया है। पळकती प्रीत काव्य की शैली को राजस्थानी भाषा की टकशाली शैली बताते हुए उन्होंने कहा कि यह पुस्तक आधुनिक राजस्थानी साहित्य को समृद्ध करने के साथ ही एक नई दिशा भी प्रदान करती है। पुस्तक में प्रेमतत्व का आंतरिक ओज अभिव्यक्त हुआ है। इसमे भाषा की लय अच्छी है। सौंदर्य बोध अपनी भाषा में कहा गया है। प्रेम तत्व केवल स्त्री-पुरूष ही नहीं बल्कि मनुष्यत्व की बात है। प्रेम में जाति – मजहब, पशु पक्षी नहीं देखा जाता है। राजस्थानी साहित्य में नए एवं युवा लेखकों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। लेखक गजेसिंह राजपुरोहित ने पुस्तक की जानकारी देते हुए बताया कि पुस्तक में राजस्थान की पुराने इग्यारे प्रेमाख्यानों पर राजस्थानी में कविताओं का सृजन किया गया है। इन प्रेम कथाओं को अमरता प्रदान करने वाले सहायक पात्र भी है। इन पात्रों ने भी प्रेम कथाओं का प्रचार किया है। कार्यक्रम का संचालन करते हुए ग्रासरूट मीडिया फाउंडेशन के सचिव प्रमोद शर्मा ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया।
इस ऑनलाइन कार्यक्रम में ख्यातनाम कवि जितेन्द्र निर्मोही, डॉ शारदा कृष्ण, मदनगोपाल लड्डा, मीठेश निर्मोही, डॉ घनश्याम नाथ कच्छावाह, गिरधर दान रतनू, डॉ गजादान चारण, दशरथ कुमार सोलंकी, नहुष व्यास, संतोष चौधरी, भंवर लाल सुथार, दुलाराम सहारण, डॉ, इन्द्रदान चारण, डॉ कप्तान बोरावड़, रीना भाटी, प्रवेश सोनी, विमला नागला, डॉ सुरेश सालवी, चेतन औदिच्य, डॉ रामरतन लटियाल सहित देश-प्रदेश के अनेक रचनाकारों तथा शोधार्थियों ने भाग लिया।

Show More

Gulam Mohammed

(EDITOR SEVA BHARATI NEWS) ==> Seva Bharti News Paper Approved Journalist, Directorate of Information and Public Relations, Rajasthan, Jaipur (Raj.), Mobile 7014161119 More »

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button