‘साहित्य संगम’ की काव्य गोष्ठी में जीवन की विसंगतियों-चुनौतियों का यथार्थ चित्रण

वेतन का दिन एक है, रोटी के दिन तीस….

जोधपुर। शहर की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था ‘साहित्य संगम’ की ओर से सोमवार को मासिक काव्य गोष्ठी का आयोजन सेठ श्री रघुनाथदास परिहार धर्मशाला के सभागार में किया गया। गोष्ठी में शहर के रचनाकारों ने कविताओं के माध्यम से जीवन की चुनौतियां-विसंगतियों, मौजूदा हालातों और इंसान की मजबूरियों का यथार्थ चित्रण किया। गोष्ठी का आगाज साहित्य संगम के संस्थापक स्मृतिशेष मदनमोहन परिहार के मुक्तकों की प्रस्तुति से किया गया।
गोष्ठी में नामवर शाइर हबीब कैफी ने समाज में बढ़ती हिंसक घटनाओं की हकीकत बयान करती गजल ‘शहर ही ठहरा लहूलुहान जब, अपने जख्मों का शुमार क्या करना’, कवि-आलोचक प्रो. कौशलनाथ उपाध्याय ने सकारात्मक सोच की कविता ‘धूप कर रही है वापसी का सफर, पर आश्वस्त हूँ’, प्रतिष्ठित गीतकार दिनेश सिंदल ने इंसान की बेबसी को अभियक्त करता गीत ‘रहा पेट के सामने, अपमानित ये शीश, वेतन का दिन एक है, रोटी के दिन तीस’, ख्यातनाम साहित्यकार पद्मजा शर्मा ने कविता ‘अड़ी हूँ, तभी तो आगे बढ़ी हूँ, यहां तक आने में, औरों से कम अपनों से ज्यादा लड़ी हूँ’ के माध्यम से समय की रफ्तार के साथ बदले सामाजिक रिश्तों की सच्चाई पेश की। सैयद मुनव्वर अली ने गजल ‘इस जमाने में चल निकली है ऐसी हवा, दिल से मिलते नहीं एक माँ के जाए हुए’, नवीन पंछी ने ‘सपने भूल जाते हैं, सपने विचरते हैं’, एम.एम. अरमान ने ‘मेरे परिश्रम का पारितोषिक हो तुम, हर हाल में तेरा मैं, मेरे पूरक हो तुम’, पूर्णिमा जायसवाल ‘अदा’ ने ‘आ गई पूर्णिमा तो उजाला हुआ, ऐ अंधेरे तेरा मुंह तो काला हुआ’, रज्जा मोहम्मद खान ने ‘दे रहा है मुझे सदा कोई’ तथा कुलदीपसिंह भाटी व रंगकर्मी रमेश भाटी ने भी काव्य रचनाएं प्रस्तुत की खूब दाद हासिल की। गोष्ठी के अंत में संस्था के अध्यक्ष इंदीवर परिहार ने कवियों के प्रति आभार ज्ञापित किया।

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