होश और बोध पूर्व जीवन जीने की आध्यात्मिक कला का नाम है संबोधि साधना : संत चन्द्रप्रभ
गांधी मैदान में मंगल मैत्री महोत्सव के साथ ध्यान शिविर का हुआ समापन, पंडाल का कोना कोना साधकों से हुआ खचाखच
जोधपुर। संत चन्द्रप्रभ महाराज ने कहा कि स्वस्थ रहने के पांच चरण हैं प्रॉपर डाइट, प्रॉपर एक्सरसाइज, प्रॉपर ब्रीदिंग, प्रॉपर मेडिटेशन और प्रॉपर रिलैक्सेशन। संबोधि साधना इन पांचों चरणों को सीखने की वैज्ञानिक और व्यावहारिक पद्धति है। संबोधि का मतलब है सम्यक बोध या संपूर्ण बोध। होश और बोध पूर्व जीवन जीने की आध्यात्मिक कला का नाम है संबोधि साधना। उन्होंने कहा कि मन के चार प्रकार है- होटल मन, हॉस्पिटल मन, होम मन और हेवन मन। होटल मन अर्थात भोग विलास में डूबा हुआ मन, हॉस्पिटल मन अर्थात बीमार मन, होम मन यानी संतुलित मन और हेवन मन यानी आनंद, उत्साह और ऊर्जा से भरा हुआ मन। संबोधि साधना करने से इंसान होटल और हॉस्पिटल मन से मुक्त होता है और होम मन से हेवन मन की और गतिशील होना शुरू हो जाता है।
संत प्रवर गांधी मैदान में 4 दिवसीय संबोधि योगा मेडिटेशन कैंप के समापन पर आयोजित मंगल मैत्री महोत्सव में सैकड़ों साधकों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि शांति, सिद्धि और प्रगति के द्वारों को खोलने का दुनिया में सबसे महत्त्वपूर्ण मार्ग ध्यान है। इंसान जब-जब दुखी, चिंतित अथवा तनावग्रस्त हुआ तब-तब ध्यान ने उसे समाधान का मार्ग दिया है। ध्यान ने अतीत को संवारा है और इसी से वर्तमान और भविष्य को संवारा जा सकता है। ध्यान तो जिंदगी की घड़ी में भरी जाने वाली चाबी है, जिसके द्वारा व्यक्ति अपने चैबीस घंटों को चार्ज कर सकता है। अध्यात्म का सार है ध्यान। जिस ईश्वरीय तत्त्व की तलाश व्यक्ति जीवनभर बाहर करता है, वह तो उसके भीतर है जिसका साक्षात्कार ध्यान से संभव है। महावीर और बुद्ध जैसे महापुरुषों ने ध्यान के माध्यम से ही परम सत्य को
उपलब्ध किया था।
उन्होंने कहा कि शरीर के रोगों को मिटाने के लिए मेडीसिन है और मन के रोगों को मिटाने के लिए मेडीटेशन है। अगर प्रतिदिन केवल बीस मिनिट का ध्यान किया जाए तो दिमाग की दौ सौ बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है। मेडीसिन रोगों को मिटाती नहीं बल्कि उन्हें दबाती है और जिस तरह से आज मेडीसिन के साइड इफेक्ट बढ़ते जा रहे हैं ऐसे में एकमात्र मेडीटेशन ही परफेक्ट एवं साइड इफेक्ट से मुक्त है। हम मेडीटेशन अपनाएं और मेडीसिन से छुटकारा पाएं।
उन्होंने कहा कि ध्यान संसार को त्यागने की नहीं, संसार में जीने की कला है। सौ जगह भटकते मन को एक जगह लाकर स्थित करने का नाम है ध्यान। उन्होंने कहा कि ध्यान केवल आँखें बंद कर बैठने का नहीं, वरन् जीवन की हर छोटी-से-छोटी गतिविधि को जागरूकता पूर्वक करने का नाम है। ध्यान का उद्देश्य व्यक्ति को एकाग्र और तरोताजा करना है। आंधे घंटे का ध्यान करके व्यक्ति चैबीस घंटों को ऊर्जावान बना सकता है। सब्जी का फीकी या खारी हो जाना, रोटी का जल जाना, पापड़ का सही न सिकना, चलते वक्त पत्थर से ठोकर खा बैठना, दुर्घटना का शिकार हो जाना, दाँत के नीचे जीभ का आना, ये सब और कुछ नहीं, ध्यान से चूकने के परिणाम है। ध्यान के प्रयोग कर विद्यार्थी शिक्षा में और व्यापारी व्यापार में नई सफलताओं को छू सकता है।
ध्यान से पाएं चचंलता से मुक्ति-संतश्री ने कहा कि आज हर व्यक्ति चचंलता से परेशान है। पूजा में, माला में, पढ़ाई में मानसिक चचंलता के चलते ये लोगों को सकारात्मक परिणाम नहीं दे पाते हैं। ध्यान से चंचलता का समाधान संभव है। ध्यान बिना सारा धर्म-कर्म निष्फल है। जिस तरह महिला पापड़ सेकते समय एकाग्र, तन्मय व जागरूक रहती है वैसे ही हर कार्य को व्यक्ति एकाग्रता से सम्पादित करने लग जाए तो जीवन की प्रगति निश्चित है। जैसे नियमित अभ्यास के कारण गृहिणी आँखों पर पट्टी बांधकर भी अच्छी रोटी बेल सकती है, वैसे ही लगातार ध्यान के प्रयोग से मन एकाग्र व शांत हो जाता है और व्यक्ति की मानसिक क्षमता, बौद्धिक प्रज्ञा और आध्यात्मिक शक्तियाँ जाग्रत होने लगती है।
ध्यान में निम्र बातों का रखें ध्यान-ध्यान की पूर्व भूमिका के रूप में संतप्रवर ने कहा कि ध्यान के लिए शांत एवं स्वच्छ स्थान का चयन करें, कपड़े श्वेत व ढीले हो, पद्मासन, सुखासन अथवा वज्रासन में बैठें, मेरुदण्ड सीधा रखें, हाथों को ज्ञानमुद्रा अथवा योगमुद्रा में रखें, आँखों को बंद कर आती-जाती श्वासधारा पर ध्यान करें और क्रमशः हृदय, मस्तिष्क और सिर की चोटी पर पाँच-पाँच मिनिट मन को एकाग्र करें। यह स्वयं को ऊर्जावान और आनन्दमय बनाने का रामबाण प्रयोग है। संतप्रवर ने ध्यान की सिद्धि के लिए अति सम्पर्क से बचने, आइने की तरह जिंदगी जीने, एकांत व मौन का अभ्यास करने और हर कार्य को सावधानी से करने के मंत्र दिए।
इस दौरान संतप्रवर ने संबोधि ध्यान साधना का अभ्यास करवाया।
श्रद्धालुओं ने की सामूहिक मंत्र, प्रभु प्रार्थना – इस अवसर पर डॉ. मुनि शांतिप्रिय सागर जी महाराज ने नवकार महामंत्र की सामूहिक प्रार्थना करवाई।