मशहूर शाइर एडी राही की जयंती की पर काव्यांजलि में नम हुई शाइरों की आंखें
जोधपुर। तुम सफर में मेरे साथ हो, अब बला से कहीं रात हा.., हम तिश्ना काम तुमसे संभाले कहां गए… ’अब ढूंढ़ते फिरो वो उजाले कहां गए… इक शिकस्ता थकान छोड़ गया, उम्र भर की उड़ान छोड़ गया… घुटन जब चाहे ले आए मुझे आवारा सडक़ों पर, मेरे घर से निकलने का कोई मौसम नहीं होता… आसमां से ज़मीं पे उतरा था, आदमी कितना साफ सुथरा था…। शाइर एडी राही मरहूम के ऐसे शेरों को दोहराते हुए बातें राही की-यादें राही की कार्यक्रम के तहत जोधपुर के उर्दू शाइरों ने अपने-अपने तौर पर उन्हें खिऱाजे-अक़ीदत पेश किया।
शाइर एडी राही की जयंती पर उनकी याद में तहजीब, बज़्मे-तामीरे-उर्दू, इम्काने-अदब, सरोकार, तहरीर, बज़्मे-उर्दू और बाजगश्त की ओर से आयोजित नशिस्त में उर्दू शाइरों ने अपने प्रिय शाइर को श्रद्धांजलि स्वरूप कलाम पेश किया और उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए उनसे जुड़े संस्मरण सुनाए। इस मौक़े पद बुजुर्ग शाइर इक़बाल कैफ़ ने सदारत करते हुए दुनिया मुसाफिरख़ाना है, आगे की तैयारी रख.. गज़ल पेश की। वहीं सरफराज शाकिर ने बात यह है कि बात कुछ भी नहीं, सिर्फ साया है साथ कुछ भी नहीं.. शीन मीम हनीफ ने एडी राही की गज़ल पढ़ी। डा. निसार राही ने चंद ख़्वाबोँ के सिवा चंद इरादों के सिवा, पास अब क्या है हमारे तेरी यादों के सिवा.., मुहम्मद अफज़ल जोधपुरी ने.. आंखों में जंगल बसे पांव थकन से चूर, रस्ता जिसके साथ है उसकी मंजि़ल दूर.. इश्राकु़ुल इस्लाम माहिर ने.. याद जैसी रहगुज़ा है तो सही, वो कहीं भी है मगर है तो सही.. जैसे अश्आर सुनाए। वहीं बृजेश अंबर ने तमाम शहर में मशहूर जो क़लंदर है, न पास जादू है उसके न कोई मंतर है रईस अहमद ’रईस’ ने.. मुझमें कितना सिमटा वो, टूटा मैं और बिखरा वा.., खो गया है आज वो सहारा भी. वसीम बैलीम ने… वक़्ते-रुख़सत वो हमसे न कुछ कह सके, ख़ामुशी से मगर बात सारी हुई.. शेर पढ़े। काव्य गोष्ठी में तमाम शाइरों के साथ इम्काने-अदब के सरपरस्त हाजी अब्दुल्लाह ताहिर, साहित्यिक संस्था तहज़ीब के सचिव नफासत अहमद और तहरीर संस्था के सचिव मुहम्मद नौमान शीरानी सहित सभी ने एडी राही के मित्र प्रतिष्ठित शाइर शीन काफ निजाम के साथ गुज़ारे लंबे साहित्यिक सफर और पचपन-साठ वर्षीय बेमिसाल दोस्ती के हवाले से कई यादें साझा कीं। संचालन मुहम्मद अफज़ल जोधपुरी ने किया।