मानवीय दखल से विदेशी परिन्दों व जलीय जीवों की जान पर खतरा

पाली जिले के बर्ड्स पैराडाइज जवाईबांध के डूब क्षेत्र में हर साल प्रजनन के लिए देश-विदेश से आते रहे हैं हजारों पक्षी


पाली। पश्चिमी राजस्थान के सबसे बड़े जवाईबांध कमाण्ड क्षेत्र में बढ़ रहे मानवीय दखल के कारण अब माईग्रेटरी पक्षियों पर खतरा बढ़ रहा है। जवाईबांध कमाण्ड क्षेत्र में लगातार बढ़ रहे मानवीय दखल की वजह से साइबेरिया से आने वाले साइबेरियन सारस गुजरे 30 सालों में यहां से मुंह मोड़ चुके है। प्रकृतिप्रेमियों की मानें तो साइबेरियन सारस के अलावा अन्य माईग्रेटरी पक्षियों की संख्या में भी लगातार कमी आ रही है। बीते सालों में यहां आने वाले सैकडों हजारों परिंदों को मानवीय करतूतों का षिकार होना पड़ा है। ऐसे में आगामी समय में यदि मानवीय दखल कम नहीं हुआ तो यहां आने वाले अन्य माईग्रेटरी पक्षी भी जवाई बांध से दूरी बना लेंगे।
जवाई बांध में हर साल बांध के डूब क्षेत्र के खाली होने के बाद सैकडों परिंदे देष-विदेष से यहां आते है। इसमें प्रमुखतः जमीन पर घोंसला बनाने वाले परिंदे स्माॅल प्रेटिनकाॅल, केंटिष प्लावर, यलोवेंन्टेड लेपविंग, रेड वेन्टेड लेपविंग, इण्डियन करसर, रिंग प्लोवर समेत सैकडों परिंदे फरवरी-मार्च से जून-जुलाई तक यहां प्रजनन कर अपने अण्डे देते है और डूब क्षेत्र में बारिष के बहकर आने वाले पानी से पहले अपने चूजे साथ लेकर दोबारा अपने देष लौटते है। स्माॅल प्रेटिनकाॅल या स्वाॅलों प्लोवर सैंकड़ों मील का सफर तय कर बंगाल, नेपाल, बांग्लादेष व श्रीलंका से राजस्थान के पाली जिले स्थित जवाईबांध में आते रहे है। ये इन्सेक्ट खाते है। इन्हें विज्ञान में ग्लारीओला लेक्टियां टेमिन्क के नाम से जाना जाता है। ये समूह में आते है और काॅलोनी बनाकर रहते है, लेकिन जवाई बांध में डूब क्षेत्र के खाली होने के बाद कमाण्ड क्षेत्र में वाहनों की आवाजाही बढ़ने तथा वाहनों के माध्यम से बडी संख्या में यहां पहुंचने वाले देसी सैलानियों के कारण डूब क्षेत्र में मानवीय दखल बढ़ रहा है। इससे परिन्दों तथा जलीय जीवों के स्वच्छंद विचरण में परेशानियां पैदा हो रही है।
डूब क्षेत्र में वाहनों की आवाजाही बढ़ने के कारण जमीन पर बने परिन्दों तथा जलीय जीवों के घोंसलों पर वाहनों के भारी-भरकम पहिये गुजरने से अंडों से बाहर निकलने के लिए आतुर पक्षी भ्रूणों को असमय ही मौत का षिकार बनना पड़ता है। वाहन के इंजन का शोर भांपकर जान बचाने के लिए बडे़ परिंदे उड़ भी जाए तो जमीन पर दिए उनके अण्डे कुचले जाते है। साल भर में सिर्फ एक बार प्रजनन के लिए जवाई बांध में आने वाले परिंदों का जीवन मानवीय करतूतों के कारण खतरे में पड़ रहा है। उन्हें असमय ही अपनी जान से हाथ धोना पड़ रहा है।
जवाई पेंथर कंजर्वेशन के कंर्जवेटर तथा वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर लक्ष्मण पारंगी कहते हैं कि हर साल फरवरी-मार्च से जून-जुलाई तक जवाई के डूब क्षेत्र में सैंकड़ों परिन्दे प्रजनन के लिए आते हैं। इनकी वजह से जवाई पक्षियों की स्वर्ग स्थली है। उन्हें देखने के लिए यहां आने वाले देसी सैलानियों के कारण उनके स्वच्छंद विचरण में मानवीय दखल बढ़ रहा है। ऐसे में जल संसाधन विभाग के साथ पर्यटन विभाग समेत अन्य एजेन्सियों को विदेशी परिन्दों की शरणस्थली संरक्षित करने के प्रयास करने चाहिए।
जानकार बताते हैं कि एक समय था, जब जवाई बांध में साईबेरियन सारस साईबेरियां से यहां प्रजनन के लिए आते थे, लेकिन पक्षियों व जलीय जीवों की शरण स्थली में मानवीय दखल से गुजरे 30 सालों से यहां साईबेरियन सारस नहीं लौटे। जवाई बांध के डूब क्षेत्र में ग्रेटर फलेमिंगो, लेसर फलेंमिंगो, काॅम्बडक, इण्डियन करसर, सारस, हिरोन, रिवर टर्न, स्माॅल टर्न, किंगफिषर, स्टारलिंग, अफ्रिकन आईबिस, व्हाईट आईबिस, स्पूनबिल, पेंन्टेड स्टार्क, ओपनबिल, ब्लेकबिंग स्टिल्ट, सेण्ड पाइपर, पेंन्टेड स्नाईप समेत हजारों प्रजाति के परिंदों ने जवाई बांध को स्वर्ग ही नही इसे ‘‘बर्ड्स पेराडाइज’’ बनाने में हमारी मदद की है। प्रकृति के इस नायाब तोहफे को हमे संभाल कर इसे मिलकर संवारने में आगे आना होगा। 

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