साइबर युग में नई पीढी को सही राह ना दिखा पाने की छटपटाहट उभरी नाटक पब्जी में

जोधपुर। आज हमने इतनी तरक्की कर ली कि अब अपने आप से डर लगने लगा है। इंसान के विज्ञान की ओर बढ़ते और बहकते क़दमों की दास्तां लेकर आया नाटक पब्जी, जिसने इशारों इशारों में ये बता दिया कि आने वाली पीढ़ी किस ओर जा रही है और उसके परिणाम क्या हो सकते हैं, उनके इस कृत्य को परिवार और समाज कैसे भुगतेगा उसी को रेखांकित करते हुए, प्रथम और सफ़ल मंचन महाराष्ट्र समाज के 118 वें गणपति उत्सव में किया गया। नाटक के लेखक और निर्देशक प्रमोद वैष्णव थे।

कथानक के अनुसार दादाजी को रात को अजीब अजीब सी आवाज़े आती हैं ऐसा लगता है कि कोई किसी पर हमला करने जा रहा है,बहुत ही ख़तरनाक हथियार लेकर,,,। उन आवाज़ों से दादाजी डर जाते है लेकिन ये डर अपने अंदर ही रखते है, किसी बताते नहीं है। धीरे धीरे कॉलोनी के और लोग भी इन आवाज़ो से ग्रसित हो जाते है सोशल मीडिया के के जरिए बात पुलिस तक पहुंच जाती है। सब कुछ उल्टापुल्टा होने बाद राज़ खुलता है कि कॉलोनी के बच्चे पब्जी खेलते हैं और ये उसी की आवाज़े हैं।
बेहद सशक्त इस प्रस्तुति में बहू के रुप में अद्वैता शर्मा, बाबूजी के किरदार में मज़ाहिर सुल्तान ज़ई, और टीटू के रुप में शैलेन्द्र व्यास ने अपनी अभिनय क्षमता से दर्शको का ख़ासा मनोरंजन करते हुए नाटक को एक अलग ही मुकाम पर खड़ा कर दिया। इसके अलावा नकुल (नकुल दवे) ,निन्नी (निहार ख़ान) इंसपेक्टर (वाजिद हसन क़ाज़ी) ने भी नाटक की गति को बरकरार रखने में अपनी सार्थक भूमिका निभाई। इसके अलावा पड़ोसन (योगिता टाक), हवलदार (सत्यनारायण चितारा), अलवीरा, रेहान बेलिम, सोहेल ख़ान और अनवर अली ने अपनी उपस्थिति दर्शाई। मंच के पीछे जिन लोगों की मेहनत थी। उनमें मंच व्यवस्था ख़लील खान, रंगदीपन (मोहम्मद इमरान), संगीत (नीलोत्पला त्रिवेदी) प्रमुख रुप से थे, मंच संचालन प्रमोद सिंघल का रहा, अंत में महाराष्ट्र समाज के अध्यक्ष देवीदास क्षीरसागर ने निर्देशक का माल्यार्पण और श्रीफल देकर सम्मानित किया।

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