अंतर्मन को सँवारने का मार्ग है ध्यान: संत श्री चन्द्रप्रभ
जोधपुर। राष्ट्र-संत श्री चन्द्रप्रभ ने कहा कि ध्यान आत्म रूपान्तरण का मार्ग है। ध्यान करना स्वयं के द्वारा स्वयं को वरदान देना है। जैसे ब्यूटी पार्लर में शरीर सँवरता हैं, ध्यान करने से वैसे ही अंतर्मन और आत्मा में निखार आता है। अशांति, तनाव और चिंता से मुक्त होकर आध्यात्मिक आनंद का मालिक बनने के लिए ध्यान सर्वाेपरि औषधि है। आत्म-ज्ञान को प्राप्त करने की कुंजी ध्यान है।
कायलाना रोड स्थित संबोधि धाम में चल रहे संबोधि ध्यान शिविर में संतश्री चन्द्रप्रभ ‘ध्यान क्यों और कैसे करें’ विषय पर संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ध्यान अध्यात्म का मार्ग है। इसके लिए कुछ भी उपक्रम करने की जरूरत नहीं, केवल मुक्त होकर जहाँ बैठे हो, वहीं आँख बंद करके अपने में उतर गए, छोटी-सी डुबकी लगा ली और अंतरजगत का आनंद ले लिया। विज्ञान और ध्यान दोनों ही प्रयोगधर्मी हैं। विज्ञान के प्रयोग बाहर और ध्यान के भीतर होते हैं। विज्ञान उस चाँद तक पहुँचाता है जहाँ से व्यक्ति मिट्टी के ढेले लेकर आता है और ध्यान उस अंतर-लोक तक पहुँचाता है, जहाँ आत्मा और परमात्मा का सत्य समाहित है।
संतश्री चन्द्रप्रभ ने ध्यान के बारे में बताते हुए कहा कि ध्यान एक प्रकार से सजग नींद है, फिर भी नींद और ध्यान में बड़ा फर्क है। आँखें तो दोनों में बंद रहती हैं, पर नींद में आदमी खो जाता है और ध्यान में बंद आँखों में भी पूर्ण सजग रहता है। नींद में चेतना और मन सो जाते हैं, पर ध्यान में ये दोनों जागृत रहते हैं। ध्यान जीवन की प्रत्येक गतिविधि के लिए भी जरूरी है। जितनी सजगता से महिला पापड़ सेकती है, अगर उतनी ही सजगता से हम जीवन को जी लें, तो जीवन के हर कदम पर ध्यान के फूल खिल सकते हैं।
संतश्री ने अपने प्रवचन में कहा कि गर्म तवे से हाथ जला, क्योंकि ध्यान चूक गए। चलते हुए गड्ढे में गिर गए क्योंकि वहाँ भी ध्यान चूक गए। भोजन करते समय गाल दाँत के बीच में आ गया क्योंकि ध्यान चूक गया। सर्वत्र जरूरी है ध्यान।
संतप्रवर ने कहा कि ध्यान-साधना के चार आधार हैं पहला आत्मा की अमरता, दूसरा आनंद मेरा स्वभाव, तीसरा आत्मा की स्वतंत्रता एवं चौथा मैं दुःख भोगने के लिए नहीं जन्मा हूँ। ध्यान के चार साधन हैं – एकांत, एकाग्रता, श्वास-संयम और प्रसन्नता। जब ये हमारे साधक के तन-मन में जुड़ते हैं तो ध्यान अपना परिणाम देता है।