मातृभाषा ने सेठिया को विश्वव्यापी पहचान दी : डॉ. राजपुरोहित

जोधपुर l महाकवि कन्हैयालाल सेठिया का सम्पूर्ण काव्य अध्यात्म एवं दर्शन पर आधारित है । उन्होंने राजस्थानी के बजाय हिन्दी भाषा में ज्यादा साहित्य-सृजन किया मगर यह सत्य है कि मातृभाषा में रचित माटी की सौरभ से परिपूर्ण कुछ काव्य रचनाओं एवं गीतों ने उनको विश्वव्यापी पहचान दी । असल में अपनी मातृभाषा के प्रति उनका यह प्रेम और समर्पण ही था, कि वो एक शब्द-ऋषि की भांति जीवन भर राजस्थानी भाषा-साहित्य की साधना में निस्वार्थ भाव से लीन रहे । नि: संदेह वो आधुनिक राजस्थानी कविता के पर्याय है । यह विचार प्रतिष्ठित कवि – आलोचक एवं राजस्थानी विभागाध्यक्ष डॉ.गजेसिंह राजपुरोहित ने ख्यातनाम कवि पद्मश्री कन्हैयालाल सेठिया की 104 वीं जयंती पर राजस्थानी विभाग द्वारा जेएनवीयू के न्यू कैम्पस स्थित राजस्थानी सभागार में सोमवार को आयोजित पुष्पांजलि समारोह में व्यक्त किए ।

राजस्थानी शोध समिति के सदस्य सवाईसिंह महिया ने बताया कि इस अवसर पर विभागीय सदस्य डॉ. मीनाक्षी बोराणा ने कवि कन्हैयालाल सेठिया के जीवन-दर्शन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए उन्हें आधुनिक राजस्थानी साहित्य का श्रेष्ठ कवि बताया। राजस्थानी रचनाकार एन.डी. निम्बावत ने मातृभाषा के महत्व को उजागर करते हुए राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता की हकदार बताया। समारोह में राजस्थानी रचनाकार भंवरलाल सुथार भी मंच पर मौजुद रहें। युवा कवि डॉ. जितेन्द्रसिंह साठिका ने सेठिया की राजस्थानी काव्य साधना पर आलोचनात्मक विचार व्यक्त करते हुए कहा कि कुण जमीन रो धणी, धरती धोरां री एवं पाथल-पीथल जैसी काळजयी रचनाओं का सृजन करने वाले कवि कन्हैयालाल सेठिया की कविताएं राजस्थानी लोक के कंठों में रची-बसी है । वो एक लोकधर्मी रचनाकार थे। शोध छात्र जगदीश मेघवाल ने सेठिया को समर्पित राजस्थानी काव्य पाठ किया ।

समारोह के प्रारम्भ ख्यातनाम कवि कन्हैयालाल सेठिया के चित्र पर माल्यार्पण कर उपस्थित शिक्षकों, रचनाकारो, शोध छात्र एवं विद्यार्थियों द्वारा पुष्पांजलि अर्पित की गई । संचालन डॉ. अमित गहलोत ने किया । सवाई सिंह महिया ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर डॉ. कप्तान बोरावड, डॉ. कीर्ति माहेश्वरी, तरनीजा मोहन राठौड़, दिलीप सिंह राव, अम्बालाल, डॉ. लक्ष्मी भाटी, डॉ. भानुमति चुण्डावत, मगराज, विष्णुशंकर, जगदीश, भींवसिंह सवाईसिंह महिया, तेजाराम, कंवर सिंह राव, नीतू राजपुरोहित, सुमेर सिंह शेखावत, माधुसिंह भाटी, शंकरलाल प्रजापत सहित विश्वविद्यालय अनके शिक्षक, राजस्थानी रचनाकार, शोध छात्र एवं विद्यार्थी मौजूद रहे।

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